मुझे स्कूल से डर लगता है

हाल की घटनाएं चाहे गुरुग्राम की हो या लखनऊ की या बीते वर्ष में पूरे देश में ऐसी अनेकों घटनाएं हुयी
प्राइवेट स्कूलों से लेकर केन्द्रीय विद्यालय व् सरकारी स्कूलों तक, यह सब क्या दर्शा रहा है| कोई इसे
अपराधिक मानसिकता का प्रभाव कह सकता है कोई इसे अपवाद भी कह सकता है| NCRB (National Crime
Records Bureau) के अनुसार 2010 से 2014 में किये गए अध्ययन के अनुसार बाल अपराधो के दर में 1.9
से 2.7 की वृद्धि हुयी| 2007 में महिला व् बाल विकास मंत्रालय द्वारा UNICEF के सहयोग से किये गए
अध्ययन के अनुसार 65% स्कूल जाने वाले यानि 3 में से 2 बच्चों को स्कूलों में शारीरिक दंड भोगना
पड़ा वहीँ हर दूसरे बच्चे को मानसिक दंड सहना पड़ा जिसमे निजी क्षेत्र व् सरकारी क्षेत्र दोनों तरह के
विद्यालय थे| ज्यादातर चर्चाओ व् पुलिस जांच विश्लेषण में बच्चों के अपराध प्रविर्ति को मुख्य कारण
माना गया है| और उसका उपाय भी केवल स्कूल में सी.सी.टी.वी. के तौर पर देख जाता है मानो वे बच्चे
नहीं अपराधी हो, यह शायद समस्या का साधारणीकरण है|
स्कूल व् बच्चों का सम्बन्ध बच्चे तय नहीं करते बल्कि माता पिता स्कूल के आकर्षण, नाम, अब तक के
बताये गए परिणामो व् उनकी आर्थिक क्षमता के आधार पर तय करते हैं| जबकि जिम्मेदारी स्कूलों की है
क्योकि यह अपेक्षा की जाती है कि उनको बच्चों के मनोवैज्ञानिक जरूरतों का ज्ञान होगा |
नॉर्थहेम्पटनशायर एजुकेशन कमेटी के द्वारा सुझाये गए सुझावों के अनुसार “स्कूल वह जगह हो जहाँ
बच्चे एक दूसरे से संवाद कर सके, जहाँ उन्हें स्वय के बारे में जानने, उनकी मानसिक व् शारीरिक
क्षमताओं को बढ़ने में मदत मिले, अनुभवों की व्याख्या करने में मदत मिले व् जीवन के अर्थों व् मूल्यों से
जुड़े प्रश्नों को समझ सके, सृजनात्मक प्रवर्ती पैदा हो, आसपास के परिवेश की समझ पैदा कर सके”
UNICEF के मैत्रीपूर्ण व् अधिकार सुरक्षित स्कूल की परिभाषा में “स्कूल बच्चों के जीवन का महत्वपूर्ण
व्यक्तिगत व् सामाजिक परिवेश का स्थान है, मैत्रीपूर्ण स्कूल यह सुनिश्चित करता है कि वहां हरेक बच्चे
को भौतिक रव् भावनात्मक रूप से सुरक्षित और मनोवैज्ञानिक रूप से समर्थकारी हो”
क्या हमारे स्कूल ऐसे मूल्यों का परिपोषण करते हुए दिखते हैं? कुछ गिने चुने स्कूलों को छोड़ दे तो
शायद लगभग सभी ऐसा करते हुए नहीं दिखते? इसका विश्लेषण करे तो ऊपर के मूल्य स्कूलों में सतही
दिखायी देने लगते हैं | जब सिद्धान्तः यह मान लिया गया है कि; हर बच्चा सीख सकता है तो हमारी
कक्षाओं में बुद्धू बच्चे क्यों होते हैं? हर बच्चे की अपनी सीखने की गति होती है तो हमारे स्कूलों में
बच्चों को एक ही गति से सीखने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ता है? हर बच्चा अलग अलग तरीके से
सीखता है तो हमारे स्कूलों में सीखने के एक ही तरीके का प्रयोग वर्षों से क्यों हो रहा है? सीखने की
कंस्ट्रक्टिव अवधारणा यानि करके सीखना सबसे कारगर है तो फिर हमारे बच्चों को रटंत प्रणाली पर कब
तक हम सिखाते रहेंगे? हमारे स्कूलों ने बच्चों की नंबर की दौड़ का धावक बना दिया है| जो दौड़ पाए वही

अच्छा शेष अगले साल उस स्कूल से निकाल दिए जायेंगे या फेल कर दिए जायेंगें| इसी फेल पास के डर
ने बच्चों को इतना हतोत्साहित कर दिया है कि वे स्कूल से दूर रहने के लिए किसी भी हद तक जा
सकते हैं| परीक्षा तो जैसे हमारे शिक्षा तंत्र का महाकाल सा हो गया है| किस स्कूल में हम बच्चों को स्वयं
की खोज के लिए प्रोत्साहित कर पा रहे हैं| सहभागिता, संवेदनशीलता, सहिष्णुता, समता, समानता के
भाव पाठ के प्रश्नों व् उत्तरों तक हैं पर दैनिक क्रियाकलापों में इनका प्रभाव है? हर स्कूल में प्रत्येक बच्चे
का दूसरे बच्चे से मारकाट प्रतियोगिता कैसे इन गुणों को प्रतिस्थापित कर पायेगी? क्यों नहीं बच्चे को
दूसरों से नहीं अपने से प्रतियोगिता का भाव जगाया जाता ताकि वह स्वयं को उत्तम बना सके|
दूसरा पहलू बच्चो के साथ होने वाले व्यवहार का है| हर बच्चा घर से बाहर सबसे अधिक स्कूल में
बिताता है और पूरे साल कई व्यक्तित्वों का सामना करता है| कई बार उसे ऐसे व्यक्तित्व भी मिलते हैं जो
उसकी जिंदगी को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं अन्यथा बच्चो को ज्यादातर ऐसे व्यक्तित्वों से
रूबरू होना पड़ता है कि उन्हें जीवन के लिए मिलने वाली प्रेरणा का अभाव साफ दिखायी देता है| ऐसा
नहीं कि शिक्षक अच्छे नहीं है लेकिन स्कूल/प्रबंधन का शिक्षक से सम्बन्ध व् व्यवहार अच्छे शिक्षक को
भी नकारात्मक बना देता है| शिक्षक कि सफलता की कसौटी समझ व् समझ के अनुसार बच्चों से
पाठ्यक्रम के सामंजस्य से ज्यादा रिजल्ट होता है, ऐसे में शिक्षक बच्चो के प्रति जबाबदेह न होकर प्रबंधन
के प्रति जबाबदेह होता है| जिसके कारण उनका कोई प्रेरणादायी व्यवहार न होना समझ में आता है|
परन्तु इसका सीधा असर बच्चो में पड़ता है| शारीरिक/मानसिक दंड जो पहले तो प्रत्यक्ष रूप में दिखायी
देता था अब RTE Act के बाद अप्रत्यक्ष दिखायी देता है| क्या ऐसा नहीं है कि अब डंडा, मुर्गा बनाना,
उंगली के बीच पेंसिल की जगह भरी कक्षा में झिडकी, अवांछित उलाहने, अति क्रोध, झुंझलाहट, खीज,
कॉपी पटकना आदि नहीं होता? क्या आज भी बच्चे से बच्चे की तुलना, बच्चो में अनावश्यक प्रतिस्पर्धा,
हर बार परीक्षाओ का डरावा, हर बार आये हुए नंबरों को याद दिलाना, PTM में बच्चे के सकारात्मक पहलू
को छोड़ केवल नकारात्मक पहलू लाना इन सबका रूप नहीं है? क्या यह सब चीजे बच्चो के स्कूल को
आनंददायी बना सकती है? क्या ऐसे स्कूल बच्चो के लिए भौतिक व् भावनात्मक रूप से सुरक्षित कहलाये
जा सकते हैं? क्या ऐसे स्कूल में बच्चो को मनोवैज्ञानिक रूप से समर्थकारी वातावरण मिल सकता है?
बच्चो के बदलते व्यवहार के लिए दोषी कौन? किस आधार पर बच्चों को स्कूल अच्छा लगने लगेगा और
क्या ये सब स्थितियां बच्चो के डर को बढाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं? हम सब सोचें|
अनूप बडोला (स्वतंत्र लेखक) संपर्क 9456593064
सामाजिक व् विकास के मुद्दों पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं

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