मेरा बाबा तो ऐसा नहीं हो सकता

आजकल बाबा भक्तों से पूछो या तो वे कन्नी काट लेंगे या कहेंगें मेरा बाबा तो ऐसा नहीं हो सकता |  बाबाओं की यह दुनिया यों ही हमारे इर्द गिर्द नहीं बनी हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं| कभी सोचे बाबाओं के पीछे जाने वाले लोग कौन हैं? धर्म के नाम पर चलने वाली इन प्रक्रियाओं का आधार क्या है? मानवीय व्यवहार के आधार पर इस प्रकार की अंध भक्ति के कारण क्या है? और इन सब में देश में स्थापित शिक्षा दर्शन की भूमिका क्या है?  देश के भविष्य के दृष्टिकोण से इन सभी प्रश्नों के उत्तर ढूँढने की आवश्यकता है| प्रश्न दर प्रश्न विश्लेषण की आवश्यकता है|

पिछले दिनों आशाराम, रामपाल, राम रहीम तथा अन्य प्रकरणों के बाद हुए विश्लेषणों से यह बात तो स्पस्ट होती है कि इन बाबाओं के पीछे तीन तरह के लोग है एक वे अंध भक्त जो समाज के शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें उनके ही समाज में हाशिये में धकेल दिया गया है| दूसरे वे लोग जिन्हें अपने काले धन को सफ़ेद करने के लिए इनसे बढ़िया जरिया कोई और नजर नहीं आता है जिनमें व्यापारी व् राजनेता वर्ग के लोग शामिल है| दूसरे तरह के लोगो को छोड़ दिया जाए तो पहले तरह के लोगों की प्रतिबद्धताओं को इस तरह देखा जा सकता है कि इस तरह के लोग अपनी एक स्वतंत्र पहचान के लिए ऐसे मंचों की और आकर्षित होते हैं जो कहीं उनकी अस्मिता को सम्मान देकर एक शशक्त व् सामूहिक प्लेटफार्म प्रदान करता हुआ दिखता है| यद्यपि कालांतर में उस समाज को पहचान देने के बजाय वे खुद को ज्यादा शक्तिशाली स्थापित करते हैं और ये समूह जो अंध अनुयायी की तरह इन बाबाबों को शक्ति प्रदान करता है ठगा जाता है| ऐसे समाज के सामने फिर एक वेक्यूम बन जाता है और इसी परिस्थिति में कुछ और बाबा या सेक्ट जन्म लेते हैं| वस्तुतः यह एक पूरा चक्र है जहाँ भोले भाले व्यक्ति समूह छले जाते रहते हैं |

मनोवैज्ञानिक तौर पर विश्लेषण करें तो मानवीय व्यवहार में मान्यताओं के बनने के आधारों में धर्म का बड़ा भाग नजर आता है| आखिर मान्यताएं बनती कैसे हैं? गौरतलब बात यह है कि व्यक्ति व् समाज की मान्यताओं के बनने की प्रकिया में धार्मिक आधार पर बनाने वाली मान्यताओं का बड़ा हिस्सा है| पुरानी मान्यताओं के बनने के पीछे व्यक्तिगत जीवन में किये जाने वाले व्यवहार, पारिवारिक परम्पराओं, सामाजिक ढांचों का बड़ा हाथ है| मानवीय रूप से कोई व्यक्ति अपने सामाजिक ढांचे से तब तक बाहर नहीं आना चाहता है जब तक वह स्वयं को वहां असुरक्षित न महसूस करे| धर्मान्तरण ऐसी ही प्रक्रिया का हिस्सा है| लेकिन इस प्रक्रिया में भी समाज एक परम्परा, मान्यता से निकलकर दूसरी परंपरा मान्यता का हिस्सा बनता है| धर्मान्तरण के बिना भी जब समाज अपने धर्म के ही अन्दर प्रचलित विचारों को तौलता है तो वह अपने पूर्वाग्रहों, पोषण व् परम्परों के अनुरूप ऐसे मार्ग को चुनता है जो उसकी प्रतिबद्धताओं व् अस्मिता को पुष्ट करता हो| बाबाओं की ये दुकाने उसी तरह हैं जहा व्यक्ति को अपने अपने पसंद का माल मिलने लगता है और वे उसके मुरीद हो जाते हैं| पहला प्रश्न यह उठता है कि हर समाज में धर्म इतना प्रभावशाली  क्यों है? एलिज़ाबेथ कुलोटा अपने एक अध्ययन में नोरंजयन का हवाला देते हुए कहती हैं कि धर्म हर संस्कृति में इसलिए प्रभावशाली है क्योकि वह अपरिचित लोगो में भी सहयोगात्मक व्यवहार पैदा करता है जो एक स्थायी समूह को जन्म देता है | दूसरे विश्लेषक मानते हैं कि धर्म वास्तव में सहयोग के साथ समूह के जैविक प्रथाओं को बढ़ाने में मदत करता है| यह भी कि धार्मिक समूह के लोग प्रतिबद्ध रूप में अपने नियमों व् समूह से बंधे रहते हैं इसलिए स्वतंत्र व्यवहार नहीं करते हैं| प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बॉबी होफमैन के अनुसार “मानवीय व्यवहार को इस आधार पर समझा जा सकता है कि मानव समूह की स्वधारणाओं के प्रति जागरूकता कितनी है? गौत्तलब है कि ये धारणाएं हमारे इरादों, जो हमारे उद्देश्यों, चरित्र, रुचियों, विशिष्ट गुणों को प्रभावित करती है और यही तय करते हैं कि हम कौन हैं व् क्या प्राप्त करना कहते हैं? अध्ययन यह भी बताते हैं कि “मानव की स्वधारणा मूलतः धार्मिक अथवा धर्म निरपेक्ष्य या राजनैतिक नहीं होती हैं बल्कि स्वधारणायें हम जो भी क्षमता रखते हैं व् हमारे प्रयत्नों से हम क्या पाना चाहते हैं के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत व् आंकलन के रूप में है|” इस विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि वे लोग जो ऐसे बाबाओं के पीछे जाते हैं दिशाभ्रम की स्थिति में होते हैं| क्योंकि जीवन के उद्देश्यों को तय करने, जानने व् समझने का एक संस्थागत तरीका अनुपस्थित होने के कारण धार्मिक (सामाजिक व्यवहार को तय करते हुए) व् राजनैतिक उपक्रम प्रभावी तौर पर स्वधार्नाओं को प्रभावित करती हैं| दुर्भाग्य यह है कि स्वतंत्र व् वैज्ञानिक विचारों के लिए शिक्षा की जगह प्रायोजित विचारों के लिए शिक्षा ने जगह ले ली है| जिसके परिणाम स्वरुप राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित साहित्य से लेकर इतिहास को समझ का आधार बना लिया गया है| और यही समझ अनौपचारिक रूप से उस वर्ग तक भी जाती है जो शिक्षा से अपरोक्ष रूप से जुड़ा हुआ है| धर्म व् धार्मिक चेतना के उपक्रम भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं पर वे स्वत स्फूर्त होने के कारण ज्यादा प्रभावी होते हैं और एक बड़े समूह को अपनी और खीचने में सफल हो जाते हैं|

मानवतावादी सामाजिक मूल्यों के संपोषण के लिए क्या दिया जाय इसका निर्णय देश की शिक्षा दर्शन तय करेगा | इस दर्शन का आधार देश का संविधान, तय नागरिक संहिता, राजनैतिक व् सामाजिक व्यवस्थाएं होनी चाहिए, जो पांच साल के नहीं बल्कि एक लम्बे समय ले लिए निर्धारित हों व् जिनके पैमाने स्थानीय से लेकर वैश्यविक हो| क्या आज तक हम इसे तय कर पाए हैं यह सोचने व् जानने की जरूरत है अन्यथा एक देश के अन्दर अनेकों समाजों का धर्म आधारित, जाति आधारित, पंथ आधारित विभाजन कोई नहीं रोक पायेगा जो हमें पुनः उसी दोराहे में धकेल देगा जहा हम एक देश बनने से पहले खड़े थे|

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