मैं और मेरी आजादी

आजादी के सांध्य के साथ आजादी का अहसास,
मेरे लिए एक ऐसा अहसास जिसे केवल पर्व के तौर पर समझा,
क्योंकि मैं आजादी के बाद की पीढ़ी से हूँ|
तो फिर मेरे लिए आजादी के मायने क्या हैं|
आजादी के मायनो की तलाश में खुद को टटोलता हूँ,
आज सोचता हूँ क्या मैं आजाद हूँ,
मैं कैसा आजाद हूँ
मेरा अपना देश कुछ सीमाओं के अन्दर संप्रभुता संपन्न
या इससे अधिक मेरे स्वतंत्र विचरने का देश शायद हाँ,
मेरे लिए कानूनन कुछ भी करने का देश शायद हाँ,
अपनी अभिव्यक्ति की आजादी शायद हाँ,
लेकिन क्या पूर्ण आजाद हूँ,
खुद की पहचान से,
जब मुझसे पूछा जाय कौन से धर्म से हो,
हिन्दू हो, मुसलमान हो सिख हो….
जब मुझसे पूछा जाय कौन सी जात से हो,
ब्राह्मण हो, राजपूत हो, कुर्मी हो लुहार हो …..
जब मुझसे पूछा जाय किस पंथ से हो
जैनी, सिन्धी, काद्यानी, रहमानी,
जब मुझसे पूछा जाय किस प्रान्त से,
गुजराती, बंगाली, मद्रासी, मराठी….
और फिर यह भी कि मेरी हैसियत अमीर की है या गरीब की

इतनी पहचानो के साथ क्या मैं मैं हूँ
मैं केवल एक भारतीय क्यों नहीं रह सकता
मेरी पहचान केवल एक इंसान के तौर पर क्यों नहीं
यही है जो मुझे शायद बार बार सोचने पर मजबूर करता है
लेकिन मैं मैं नहीं हो सकता क्योकि
इस लोकतान्त्रिक देश में मैं एक वोट हूँ, मेरी इससे ज्यादा कोई औकात नहीं है,
मेरा अधिकार तय होता है मेरे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक होने पर,
और मेरी अस्मिता भी क्योंकि धर्म, जाति, पंथ, प्रान्त के बिना मेरी कोई पहचान नहीं
मैं क्यों नहीं रह सकता आजाद
आजाद धर्म के बंधन से, जाति के बंधन, पंथ के बंधन से,
आजाद प्रांतीय अस्मिता से, आजाद भाषाई अस्मिताओ से,
आजाद स्वयं के इस डर से कि बिना जात, धर्म, पंथ के कोई मुझे कैसे पहचानेगा,
आजाद उन परम्पराओ से, रस्मो रिवाजो से, उन सामाजिक कस्मो से जो मुझे रूढ़िवादी बनती हैं,
मुझे मैं रहने दो, मुझे इंसान रहने दो
मुझे मत बांटो अपनी सत्ता के खातिर,
कही ऐसा न हो मेरा मैं जाग जाय और एक नयी क्रांति का जन्म हो
मुझे मैं रहने दो |

अनूप बडोला (स्वतंत्र लेखक) संपर्क 9456593065
सामाजिक व् विकास के मुद्दों पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं

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