सफलता व सीखने का जश्न

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सफलता के सही अर्थों में जाएँ तो यह वह अनुभूति है जो किसी व्यक्ति के लक्ष्यों या उद्देश्यों के परिणाम के तौर पर है व उस व्यक्ति के लिए नए लक्ष्य गढ़ने का आधार बनाती है | जो व्यक्ति के स्वयं के लिए है क्योंकि दूसरों की सफलता की अनुभूति का दृष्टा दूसरा ही हो सकता है| किसी की सफलता दूसरों के लिए प्रेरणा का श्रोत हो सकती है जो अलग अलग क्षेत्रों में विशेषकर व्यवसाय के क्षेत्रों में पैमानों के रूप में भी लिए जाते हैं | पर शिक्षा जैसे उपक्रम में ऐसा होना संभव नहीं है क्योंकि सीखना, निजी होता है व क्यों सीखना है, पर निर्भर करता है| साथ ही कई अर्थों में  शिक्षा याने कि सीखना (केवल किताबी शिक्षा नहीं) सफलता के मार्ग बनाती है| यह बात उस संदर्भ में है जब हमारे समाज में एक या कुछ बच्चों की अंकों की सफलता को दूसरे सभी बच्चों के लिए पैमाना बना दिया जाता है| सायास शिक्षा में भी सफलता का पैमाना क्या हो यह भी तय होना आवश्यक है| सफलता का भाव जब स्वयं के लिए सकारात्मक है तो उसे स्पर्धा के खांचे में लाकर हम इस भाव को नकारात्मक तो नहीं बना रहे हें| क्या सीखने के क्रम में वास्तविक स्पर्धा दूसरों से हो सकती है क्योकि सीखना जाँचने में “आप क्या कर पाये हैं” व “आप क्या करने में सक्षम थे” को जानना है न कि स्पर्धा| और यदि सकारात्मक स्पर्धा हो भी तो स्वयं की स्वयं से स्पर्धा को बल क्यों नहीं दिया जाता और उसे ही पैमाना क्यों नहीं बनाया जाता | क्या हम 50-100 सफलतम शिक्षार्थियों के शोर में लाखों कम सफल शिक्षार्थियों के सीखने के क्रम को  बाधक तो नहीं बना रहे हैं| यदि जश्न ही हो तो सीखने का जश्न हो | सीखने का जश्न उन सबका हो सकता है जो भले ही आकांक्षाओं की उस ऊंचाई तक न पहुंचे हो लेकिन कल तक जितना सीखे थे आज उससे अधिक व नया तो सीखे हें| क्या सीखना केवल विषयनिष्ठ है या व्यक्तिपरक है? सीखने तो व्यक्तिपरक होना चाहिए क्योंकि हर नया सीखने के साथ व्यक्ति स्वयं के लिए नए लक्ष्य गढ़ सकता और शायद यही तय करेगा कि वह क्या बनना चाहता या चाहती है| एक असंतुष्ठ समाज में जहां सफलताओं कि धुरी में सिर्फ पैसा हो व उसके पैमाने सिर्फ अंक हों उस समाज को कितना सहिंष्णु, समानता व मानवता वादी रख पाएगा एक प्रश्न है | जिसका सामना आज पूरी दुनिया कर रही है|

हर वर्ष कि भांति सी॰ बी॰ एस॰ ई॰, आई॰ सी॰ एस॰ ई॰ और  स्टेट बोर्ड के परिणाम बच्चों के लिए एक सुखद अनुभव हो सकते हें जो होने भी चाहिए क्योकि सफलता सकारात्मक भाव है| यह अलग बात है कि बच्चों को हर कक्षा की इन परीक्षा सीढ़ियों (परीक्षात्मक पैमाने) को पार करने में अपना पूरा ज़ोर लगाना पड़ता है| जो सबसे ज्यादा अंक के साथ इन सीढ़ियों को पार कर जाता है उसकी सफलता का जश्न केवल वह बच्चा व उसका परिवार ही नहीं उसका स्कूल भी मानता है| विशेषकर लक्ष्य (500 या निश्चित अंक) छू लेना या पहुँच जाना एक विशेष उपलब्धि गिनी जाती है| अंकों की सफलता का जश्न हमारे जैसे कुछ देशों का एक विशेष पर्व बन गया है और उस पर्व की  तस्वीरें बड़े से छोटे अखबारों में पारंपरिक रूप से प्रमुख जगह पाने लगी हें| और ज़्यादातर कोचिंग केन्द्रों के लिए ये तस्वीरें प्रचार का सरल व प्रभावी माध्यम बन रही हें| सफलता के इस जश्न के बीच असफलता के दुख में बच्चों का आत्महत्या या फिर लाखों बच्चों का अवसाद में चले जाना (क्योंकि सभी बच्चे आत्महत्या तो नहीं करते) शायद एक और पहलू है जो इस शोर में कहीं खो जाता है| लेकिन विचारणीय तो है ही| मेरे ही पड़ोस में एक रुई धुनने वाले के बच्चे का फांसी पर लटक जाना प्रश्न खड़े करता है हमारे पैमानों पर| पैमाने जो स्कूलों ने अगली पायदान के लिए गढ़े हें, पैमाने जो समाज ने अपने सम्मान के लिए व कुछ अलग दिखने के लिए गढ़े हें और पैमाने जो जीवन में अलग बनने के लिए गढ़े गए हें| स्कूल व समाज एक दिशाएँ तो दे सकते हें लेकिन दिशा का निर्णय बच्चे पर छोड़े तो क्या हर्ज है? हर सफलता डॉक्टर, इंजीनियर, टेक्नोक्रैट की ओर ही जाये यह तो जरूरी नहीं क्योंकि जीवन के अन्य रंग भी उतने ही महत्वपूर्ण हें| विशेष रूप से जब हम 10वी व 12वी पायदान तक शिक्षा के उद्देश्यों अनुरूप उस छात्र/छात्रा में चिंतनशीलता, विवेक व निर्णय लेने की क्षमता पर शिक्षण कर चुके हें| ऐसा नहीं होना व सफलता के पैमाने हमारी शिक्षा में प्रश्न खड़े करता है|

शिक्षा में सफलता ठीक उसी तरह है जैसे पहाड़ की चोटी में चढ़ते हुये गिरते फिसलते हुये आखिर आप चोटी पर चढ़ ही जाते हैं और आपका लक्ष्य फिर एक नयी चोटी होता है| चोटी में पहुँचने का आनंद कुछ और ही होता है| हर शिक्षाक्रम में लाखों शिक्षार्थी होते हें वे भी किसी न किसी उचाई तक पहुँचते हें सभी जश्न के हकदार हें | सफलता के सापेक्ष असफलता को धिक्कारना भी प्रश्न गत है| क्योंकि सफलता के मायने यों तो स्थिति के अनुसार गढ़े जा सकते हें परंतु छात्र जीवन में यह अपेक्षित लक्ष्य या मिशन जो उसे चिंतनशील, समस्याओं का तार्किक पूर्ण समाधान, समाज के विकास में आर्थिक व सामाजिक रूप से योगदान करने वाला बना सके, को प्राप्त कर लेना ही लिया जा सकता है | उद्देश्य व मिशन छोटे बड़े हो सकते हैं व्यक्तिपरक भी हो सकते हें | इस सफलता के साथ जीवन में सफलता का लक्ष्य भी जुड़ा हुआ है क्योंकि यही जीवन की वह स्थिति है जो जीवन जीने की कला को तय करती है |

स्कूल व माता पिता यदि यह समझ पाएँ कि “हर बच्चा विशिष्ट है” तो हम सीखने का जश्न मानना शुरू कर सकते हें भले ही बच्चा किसी भी ऊंचाई पर हो| यह भी कि ऊंचाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है सीख व सृजित ज्ञान|

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